जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक खेती

लेखक: रमन कान्त

कृषि का पर्यावरण के साथ सदियों से गहरा नाता रहा है। खासकर भारत जैसे कृषि प्रधान देश में अनुकूल आबोहवा और पारिस्थितिकी ने इस क्षेत्र को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है। कृषि क्षेत्र न केवल देश की रीढ़ है बल्कि 70 प्रतिशत आबादी को रोजगार भी उपलब्ध करवाता है। यही नहीं देश की अर्थव्यवस्था में इसका योगदान 17 प्रतिशत से ऊपर है। मगर पिछले कुछ दशकों से मौसम में आ रहे बदलाव कृषि पर प्रभाव डाल रहे हैं। फसल बुआई के बाद लंबा होता सूखे का दौर, बढ़ती गर्मी से नमी में कमी और सिंचाई के साधनों का सिकुड़ना तथा फसल कटाई से पहले बारिश खेती की मुश्किलों को बढ़ा रहा है। साथ ही बेहतर उत्पादन और फसलों सुरक्षा हेतू रसायनों का बढ़ता प्रयोग भी स्थिति को बदतर बना रहा है। अंततः अस्थिर उत्पादन और बढ़ती लागत से तंग आकर धीरे-धीरे किसान खेती छोड़ रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं।

इन सब चुनौतियों को देखते हुए ऐसी खेती पद्धतियों की जरूरत है विपरीत मौसमी परिस्थितियों में भी अच्छा उत्पादन दे सकें। स्थानीय पारिस्थितिकी और भौगोलिकता के अनुरूप यह विधियां पर्यावरण हितैषी हों ताकि जलवायु परिवर्तन के खतरों को कम किया जा सके। प्राकृतिक खेती कृषि की ऐसी ही विधा है जो पर्यावरण के साथ सामंजस्य बनाते हुए कम लागत में खेती करने में सहायक है। यह तकनीक रसायनों को हतोत्साहित कर देसी गाय के गोबर-मूत्र और स्थानीय वनस्पतियों पर आधारित आदानों के प्रयोग का अनुमोदन करती है। इस खेती में देसी केंचुओं की गतिविधियों को तीव्र कर उर्वरा शक्ति को बढ़ाया जाता है। साथ ही भूमि के जैविक कार्बन को बांधकर रखा जाता है ताकि वह मुक्त होकर वातावरण को गर्म न कर पाए। इस विधि को अपनाने से किसान की बाजार पर निर्भरता कम होती है और साथ ही पर्यावरण पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है।

ग्लोबल क्लाइमेट रिस्क इंडेक्स 2021 के अनुसार, भारत जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित दस शीर्ष देशों में शामिल है। जलवायु की बदलती परिस्थितियां कृषि को सबसे अधिक प्रभावित कर रहीं हैं। वैश्विक स्तर पर हो रहे अनुसंधान साफ करते हैं कि जलवायु परिवर्तन और कहर बरपाएगा जिसका सबसे ज्यादा असर विकासशील देशों के कृषि क्षेत्र पर होगा। जानकार कहते हैं कि भारत में 2010-2039 के बीच जलवायु परिवर्तन के कारण लगभग 4.5 प्रतिशत से 9 प्रतिशत के बीच उत्पादन के गिरने की संभावना है।

हिमाचल के परिपेक्ष्य में देखें तो यहां बागवानी का भी बोलवाला है। प्रदेश को फ्रूट वाउल ऑफ इंडिया की संज्ञा भी दी गई है। बागवानी से जहां प्रदेश को 5 हजार करोड़ से अधिक की आय मिलती है वहीं 7 लाख लोगों को रोजगार मिलता है। जलवायु परिवर्तन का इस क्षेत्र पर गहरा प्रभाव पड़ रहा है। पिछले सीजन की बात करें तो मौसम में आए अचानक बदलाव के चलते सेब का उत्पादन लगभग आधा रह गया। जहां 2022 में 4 करोड़ सेब की पेटियों का उत्पादन हुआ था वहीं 2023 में यह सिमटकर लगभग 2 हजार पेटी रह गया। इससे प्रदेश के बागवानी क्षेत्र को लगभग 2 हजार करोड़ का नुक्सान हुआ है।

जलवायु परिवर्तन के चलते सेब की कई वेरायटी अब आशातीत उत्पादन नहीं दे पा रही जिससे बागवान समुदाय चिंता में है। इसके अलावा सेब बागवानी अब ऊंचे क्षेत्रों की ओर खिसकती जा रही है। निचले क्षेत्रों में जरूरी चिलिंग ऑवर पूरे न होना, कीटों और रोगों का बढ़ता प्रकोप आदि कारकों से बागवानी प्रभावित हो रही है। कीटों से फसल सुरक्षा के लिए महंगी दवाइयों का छिड़काव बागवानी की लागत को भी बढ़ा रहा है। ऐसी स्थितियों में बाजार में सही दाम न मिले तो बागवानों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। मगर प्रदेश के बागवानी क्षेत्र के लिए भी प्राकृतिक खेती एक आशा की किरण बनी है। इस विधि से प्रदेश के हजारों बागवानों ने कम लागत में सफलतापूर्वक उच्च गुणवत्तायुक्त उत्पादन लिया है। कीट सुरक्षा हेतू महंगे आदानों को छोड़ बागवान प्राकृतिक खेती से ही इनका सफल प्रबंधन कर रहे हैं। इससे बाकियों के मुकाबले जहां उनकी लागत कम हो रही है वहीं शुद्ध मुनाफा भी बढ़ रहा है।  

हाल ही में प्राकृतिक खेती पर हुए शोध दर्शाते हैं कि इस विधि से विपरीत परिस्थितियों में भी बेहतर उत्पादन लिया जा सकता है। इस विधि से उगाई फसलें सूखे, अतिवर्षा में भी खड़ी रहती हैं। मिश्रित खेती अपनाने से एक ही खेत में कई फसलें ली जा सकती हैं जिससे किसान को नियमित आय सुनिश्चित होती है। इस खेती में पानी की खपत बाकि विधियों के मुकाबले 40% तक कम है और फसल सुरक्षा के लिए भी स्थानीय वनस्पतियों को ही प्रयोग किया जाता है।

जलवायु परिवर्तन आम जनमानस के जीवन को भी प्रभावित कर रहा है। बढ़ती बीमरियां, कम होती रोग प्रतिरोधक शक्ति और पोषण जरूरतें पूरी न होने से बढ़ रही अल्परक्तता अक्सर देखने को मिल रही है। नेशनल फैमिली हैल्थ सर्वे-5 (2019-21) के आंकड़ों पर ध्यान दें तो यह सामने आता है कि प्रदेश में माताओं-बहनों और बच्चों को सही पोषण नहीं मिल पा रहा है। प्रदेश के 10 जिलों में कुपोषण की दर बढ़ रही है। इसका बड़ा कारण है सही और पोषणयुक्त फल-सब्जी की उपलब्धता न होना। प्राकृतिक खेती पोषणयुक्त खाद्यान्न की मांग को पूरा करने में अहम साबित हो सकती है। बिना रासायनों के तैयार की जाने वाली फल-सब्जी अगर उपभोक्ताओं तक पहुंचती है तो इस स्थिति को निश्चित तौर पर सुधारा जा सकता है। प्रदेश में प्राकृतिक खेती के पोषणयुक्त उत्पादों को उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के लिए हिमाचल सरकार ने प्रयासों में तेजी लाई है।

प्राकृतिक खेती के अच्छे परिणामों को देखते हुए गुजरात, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश सहित देश के एक दर्जन के करीब राज्य इसे अपना रहे हैं। केंद्र सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने भी प्राकृतिक खेती को सतत् खेती गतिविधियों में सम्मिलित करते हुए इसपर एक राष्ट्रीय कार्यक्रम “नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फार्मिंग ” की शुरूआत की है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत देशभर में किसानों को संगठित कर प्राकृतिक खेती आधारित कल्स्टर बनाए जा रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में भी ऐसे कल्स्टर काम कर रहे हैं। केंद्र सरकार ने गंगा नदी के किनारे 5 लाख हैक्टेयर भूमि को सतत् खेती में परिवर्तित करने का लक्ष्य रखा है जिसपर तेजी से काम चल रहा है।  

जलवायु परिवर्तन पर कृषि वैज्ञानिकों ने चेताया है कि अगर हम इसी तरह से खेती-बाड़ी करते रहें तो दुनिया में केवल 60 वर्षों तक ही खेती की जा सकती है। ऐसी स्थिति में कृषि को भविष्य के लिए संजोने रखने हेतू प्राकृतिक खेती ही सबसे उत्तम विकल्प है।

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